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साबुन और डिटर्जेंट : निर्माण व रासायनिक संरचना ।

साबुन और डिटर्जेंट: निर्माण व रासायनिक संरचना

साबुन व डिटर्जेंट रासायनिक यौगिक या यौगिकों का मिश्रण हैं जिनका प्रयोग वस्तुओं की शोधन/धुलाई के लिए किया जाता है | इनका विस्तार से विवरण नीचे दिया गया है :
साबुन
साबुन सोडियम या पौटेशियम लवण तथा वसीय अम्लों का मिश्रण होता है जो पानी में शोधन क्रिया (Cleansing Action) करता है| सोडियम स्टेराइट(Sodium stearate),सोडियम ओलिएट (sodium oliate) और सोडियम पल्मिटेट (sodium palmitate)  साबुन के ही कुछ उदाहरण हैं जिनका निर्माण क्रमशः स्टियरिक अम्ल (stearic acid), ओलिक अम्ल (oleic acid) व पामिटिक अम्ल (palmitic acid) से होता है | साबुन में वसा (Fat) और तेल (Oils) पाए जाते हैं |
सोडियम साबुन कठोर होता है इसलिए इसका प्रयोग कपड़े  धोने के लिए किया जाता  है एवं पोटैशियम साबुन मुलायम होता है इसलिए इसका उपयोग नहाने एवं दाढ़ी बनाने में होता है। इनके अलावा कार्बोलिक साबुन का उपयोग त्वचा से सम्बंधित रोगों  के इलाज व कीटाणुनाशक के रूप में किया जाता है।
साबुन मैल को कैसे साफ़ करता है ?
अधिकांश मैल तेल किस्म का होता है इसीलिए जब मैले वस्त्र को साबुन के पानी में डाला जाता है तो तेल और पानी के बीच का पृष्ठ तनाव बहुत कम हो जाता है और वस्त्र से अलग होकर मैल छोटी- छोटी गोलियों के रूप में तैरने लगता है| ऐसा यांत्रिक विधि से हो सकता है अथवा साबुन के विलयन में उपस्थित वायु के छोटे-छोटे बुलबुलों के कारण हो सकता है। साबुन का इमल्शन (Imulsion) अलग हुए मैल को वापस कपड़े पर जमने से रोकता है | 
भारत में साबुन निर्माण का इतिहास
भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान इंग्लैंड के लीवर ब्रदर्स ने पहली बार आयात कर आधुनिक तरीके के साबुन भारत में पेश किये । लेकिन 'नॉर्थ वेस्ट सोप कंपनी' पहली ऐसी कंपनी थी जिसने 1847 ई. में भारत में साबुन बनाने का कारखाना स्थापित किया | साबुन की कामयाबी की एक अहम कड़ी में बाद में 1918 ई. में जमशेदजी टाटा ने केरल के कोच्चि में 'ओके कोकोनट ऑयल मिल्स' खरीदकर भारत के साबुन बनाने के पहले स्वदेशी कारखाने की स्थापना की |
साबुन की निर्माण प्रक्रिया / साबुनीकरण 
साबुन के निर्माण के लिए आवश्यक वसा (Fat) और तेल (Oils) को पौधों व जन्तुओं से प्राप्त किया जाता है| साबुन निर्माण की प्रक्रिया को ‘साबुनीकरण (Saponification)’ कहते हैं | साबुन बनाने के लिए तेल या वसा को कास्टिक सोडा के विलयन के साथ मिलाकर बड़े-बड़े बर्तनों में लगभग 8 घंटे तक उबाला जाता है। अधिकांश तेल साबुन बन जाता है और ग्लिसरीन उन्मुक्त (Release) होता है। अब बर्तन में लवण डालकर साबुन का लवणन (salting) कर निथरने को छोड़ दिया जाता है | साबुन ऊपरी तल पर और जलीय द्रव निचले तल पर अलग-अलग हो जाता है। निचले तल के द्रव में से ग्लिसरीन को निकाल लेते हैं। साबुन में क्षार (Base) का सांद्र विलयन डालकर तीन घंटे तक फिर गरम करते हैं। इससे साबुनीकरण की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। साबुन को फिर पानी से धोकर 2 से 3 घंटे उबालकर थिराने के लिए छोड़ देते हैं। 36 से 72 घंटे के बाद ऊपर के स्वच्छ चिकने साबुन को निकाल लिया जाता है। यदि साबुन का रंग कुछ हल्का करना हो, तो थोड़ा सोडियम हाइड्रोसल्फाइट डाल देते हैं।
Jagranjosh
साबुन निर्माण की प्रक्रिया
कपड़े धोने वाले साबुन में 30% पानी रहता है जबकि नहाने के साबुन में पानी की मात्रा 10% के लगभग होती है |यदि नहाने का साबुन बनाना है, तो सूखे साबुन को काटकर आवश्यक रंग और सुगंधित द्रव्य मिलाकर पीसते हैं, फिर उसे प्रेस में दबाकर छड़ (बार) बनाते और छोटा-छोटा काटकर उसको मुद्रांकित करते हैं। पारदर्शक साबुन बनाने में साबुन को ऐल्कोहॉल में घुलाकर तब टिकिया बनाते हैं। कसाबुन के निर्माण में प्रयोग होने वाले तेल के रंग पर ही साबुन का रंग निर्भर करता है। सफेद रंग के साबुन के लिए तेल और रंग की सफाई आवश्यक है। तेल की सफाई तेल में थोड़ा सोडियम हाइड्रॉक्साइट का विलयन (Solution) मिलाकर गरम करने से होती है। साबुन को मुलायम अथवा जल्द घुलने वाला और चिपकने वाला बनाने के लिए उसमें थोड़ा अमोनिया या ट्राइ-इथेनोलैमिन मिला देते हैं।
डिटर्जेंट
डिटर्जेंट धुलाई /शोधन के लिए वह साबुन की तुलना में  बेहतर होता है क्योंकि पानी की कठोरता का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है | डिटर्जेंट में पेट्रोकेमिकल विलयनों (Solutions) का प्रयोग होता है | पेट्रोकेमिकल और ओलियो केमिकल्स ,सल्फरट्राईऑक्साइड ,सल्फ्यूरिक अम्ल, एथिलीन ऑक्साइड आदि ऐसे ही कुछ पदार्थ है | क्षार (Alkali) के रूप में पौटेशियम और सोडियम का प्रयोग किया जाता है |
साबुन व डिटर्जेंट निर्माण हेतु सावधानियाँ
1. साबुन का हाथों या कपड़ों पर कोई विषैला या खतरनाक प्रभाव न पड़े|
2. चूँकि साबुन में पानी व रसायन शामिल होता है अतः यह जाँच की जानी चाहिए कि खुले पर्यावरण में या सूर्य के प्रकाश में आने पर इनमें पर्यावरण के प्रति कोई हानिकारक क्रिया न हो |
3. यह जाँच भी की जानी चाहिए कि निर्माण के बाद कितने समय के अन्दर इनका उपयोग किया जाना उचित होगा 

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